Najrane

  • INSANITY OF PRAYERS - INSANITY OF PRAYERS Often, we start our day with prayers- willingly or not willingly, Early in the morning all of the religious institutions start chant...
    5 years ago

Monday, April 1, 2013

"जलती मोमबती-बुझती मशाल"

 
"जलती मोमबती-बुझती मशाल"
 
चलने वाले अंगारों पर, आज बहाने बनाने लग गये,,,
हाँ,,,
छोड़ हाथों से मशाल, वो मोमबती जलाने लग गये,,,
 
अजीब तमाशा मॅंडी में, हर कोई तस्वीर मे आना चाहता है
उल्टे सीधे कारे करके यारो, बस टीवी पर छाना चाहता है
फूँक ग़रीबो की कुटिया, वो अपना महल बनाना चाहता है
"इस बार-हमारी सरकार" का, वो पोस्टर छपवाना चाहता है

तभी तो
शहीदो की चिताओं पर, लोग रोटी पकाने लग गये,,,
हाँ,,,
छोड़ हाथों से मशाल, वो मोमबती जलाने लग गये,,,
 
राम सेतु- बाबरी मस्जिद पर, क्या आग लगाने निकले हैं
महादेव-अल्लाह-2 चिल्ला, वो तो जनाज़ा सजाने निकले हैं
लूटी हुई संस्कृति के लिए, वो क्या गदर मचाने निकले हैं
अरे
इंसान यहाँ तिल-2 मरता और वो गाएँ बचाने निकले हैं 
अब
एक गाँधी के लिए, वो भगत सिंह को बरगलाने लग गये,,,
हाँ,,,
छोड़ हाथों से मशाल, वो मोमबती जलाने लग गये,,,
 
रगों का जोश-जवानी का जज़्बा, कुछ मंदा-मंदा सा हो गया
उफनता था जो हिचकोलो पर, वो आज ठंडा-ठंडा सा हो गया
क्रांति की बातें करना भी अब, यहाँ पर गंदा-गंदा सा हो गया
"अमिर" तेरी बातों मे भी अब, कुछ तो धंधा-धंधा सा हो गया

भाई तुझ जैसे
तलवार चलाने वाले, पैसे खातिर कलम चलाने लग गये,,,
चलने वाले अंगारों पर, आज बहाने बनाने लग गये,,,
छोड हाथों से बंदूक, वो अब मोमबति जलाने लग गये
Dev Lohan “अमिर”

 

Monday, December 31, 2012

“दिल्ली का तमाशा”


साथियो, हो सकता है मेरे विचार बहुत सारे लोगों को पसंद ना आएँ पर जो मैने दिल्ली मे 2 दीनो मे महसूस किया वो मैने लिखा है

“दिल्ली का तमाशा”


वाह भई वाह कल एक अजब तमाशा देखा
JNTR-MNTR पर टीवी  लिए आदमी बदहवासा देखा

सज-धज पिकनिक करने लोग वहाँ आए थे
रंग-बिरंगे उजले-उजले वो ढोंग साथ लाए थे
चारों ओर ही नाचने-गाने वाले वहाँ छाए थे
बस एक ओर कुछ लगा रहे नारे हाए-हाए थे

जलते चिरगों तले बुझता हुआ एक माशा देखा
वाह भई वाह कल एक अजब तमाशा देखा

कुछ के हाथों डफलियाँ, कुछ के हाथों दिए थे
कुछ ने CAMERA  के लिए  नए कपड़े सीए थे
उस मातम मे भी बहुत लोग दारू पिए थे
Painted  चेहरे बस TV की सुर्ख़ियों के लिए थे

सरकार का दिया हँसी एक ओर झांसा देखा
वाह भई वाह कल एक अजब तमाशा देखा

एक बहन ने कहा, अहिंसा के यहाँ सब पुजारी है
आज़ादी माँगने का ये संघर्ष हमारा यहाँ जारी है
बैठ के तुम भी गाने गाओ, नारे लगाना गद्दारी है
भाई SIDE होज़ा, TV पर आने की अब मेरी त्यारी है

लीपे-पुते उन चेहरों का बुझा हुआ दिलासा देखा
वाह भई वाह कल एक अजब तमाशा देखा

मैने कहा-
आज़ादी के लिए तो लाशें गिनना पड़ता है
गोलियों बीच लफ़्ज-ए-आज़ादी बीनना पड़ता है
MAKE-UP वाले चेहरे पर खून लिन्ना पड़ता है
“अमिर” बंद कर गाना बजाना-
आज़ादी मिलती नही उसे तो प्यारे छीनना पड़ता है

वहाँ लागो का लोगो के उपर एक पाशा देखा
वाह भई वाह दिल्ली मे एक अजब तमाशा देखा
DEV LOHAN- "AMIREAA"




Monday, November 5, 2012

मेरी तमन्ना-My desire

दोस्तो , पिछली कविता "उजड़े-गाव" को मिले आपके अपार प्यार के लिए आपका धन्यवाद...

मेरी नई कविता "मेरी तमन्ना-My desire" एक कहानी है ,हर उस नोजवान की जो अपने सपनो की दुनिया खोजता है, जो सपने देखता है और अपने सपनो को सच करने का संघर्ष करता है, और पल पल ,,हर पल आपने दिल से क्या कहता रहता है, वो आपके सामने है



"मेरी तमन्ना-My desire"


जहाँ हवा बसंती बहती हैं, जहाँ खुशियाँ करकल करती रहती हैं

जहाँ गीत फिजायँ गाती हैं, जहाँ कलियाँ भवरों संग बह जाती हैं


ले चल ए मॅन बावरे तू मुझे वहाँ पर


जहाँ दुख दर्द सभी का साझा हो,

दूसरो को पछाड़ने का ना कोई तक़ाज़ा हो

इंसान जहाँ का सीधा-साधा हो,

ना टूटता किसी का वादा हो,


ले चल ए मॅन बावरे तू मुझे वहाँ पर


जहाँ आफताब शितिज से मिलता हो

सरे जमाने जहाँ निर्मलता हो

जहाँ हर फ़ानूस पर काम हो

हर कामगार को मिलता सही दाम हो


ले चल ए मॅन बावरे तू मुझे वहाँ पर


जहाँ मदहोश घ्टाएँ छाती हो,

जहाँ सचे हमनवां साथी हो

जहाँ कॅलम की साची लिखावट हो

जहेन मे बसी सचाई की बनावट हो


ले चल ए मॅन बावरे तू मुझे वहाँ पर


जहाँ ना च्काचोन्द वीरनीयाँ हो

जहाँ ना डकी हुई हेरआनीयाँ हो

कॅलम के नाम पर ना कोई बहेरिया हो

सेव्च्नद लिख सकता जहाँ “अमीरिया” हो


मेरे मॅन बावरे..

ले चल तू मुझे वहाँ पर.............


Dev Lohan-Amireaa

Sunday, October 28, 2012

"उजड़े गाव"

"उजड़े गाव"

शहराँ की इस दौड़ ने, ना जाने कितने गाम उजाड़े हैं
सुधारण खातिर अपना उल्लू, इन्हाने सारे काम बिगाड़े हैं

ला के आग महारे घराण मे, ये खुद चैन ते सोवे हैं
अपनी सुख-सुविधा खातिर, ये गामा के चैन ने खोवे हैं
बहका के हमने, महरी जिंदगी मे बीज दुखा के बोवे हैं
रे ये के जानेह,
उज्ड़ेह पड़े इन घराँ मैं, भूखे-प्यासे कितने बालक रोवे हैं

मुर्दें के ये कफ़न बेच दें, इतने तगड़े ये खिलाड़े हैं
शहराँ की इस दौड़ ने, ना जाने कितने गाम उजाड़े हैं

जो धरती है जान ते प्यारी, वो माँ महरी ये खोसे हैं
छल-कपटी समाज के निर्माता, आज म्हारे उपर धोसे हैं
खुद खा जावे लाख-करोड़, अर् म्हारी subsides ने कोसे हैं
शर्म आनी चहिय तमने, तहारा ख़ाके ताहारे उपर भोसे हैं

भूल गये उपकार हमारे, सिंघो तहारे उपर गिदर दहाड़ै हैं
शहराँ की इस दौड़ ने, ना जाने कितने गाम उजाड़े हैं
सुधारण खातिर अपना उल्लू, इन्हाने सारे काम बिगाड़े हैं


Dev Lohan-Amireaa